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महोदय, यहाँ यह उल्लेखनीय है कि शीत युद्ध की समाप्ति व समाधान एशिया की घटनाओं तथा अफगानिस्तान से सोवियत सेना की वापसी से ही हुआ है। अफगानिस्तान में लंबे अरसे तक चला युद्ध सोवियत संघ के अस्तित्व के लिए कष्टदायी और मुश्किल हो गया। इस भयावह युद्ध से सोवियत सेनाओं की वापसी से अनेक घटनाएँ जन्मी, जिनकी परिणति शीत युद्ध की समाप्ति में हुई, जिसमें जर्मनी का एकीकरण तथा सोवियत संघ का विघटन शामिल है। संक्षेप में, शीत युद्ध और इस तनाव का एशिया की एकता पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। एशिया के सभी देश यह चाहते थे कि क्षेत्र में शांति बनी रहे। चीन और सोवियत संघ का सीमा विवाद, चीन और वियतनाम का झगड़ा और भारत व चीन का सीमा विवाद उस समय की परिस्थितियों को स्पष्ट करता है। इस तरह से पाकिस्तान पूरी तरह से थाईलैंड और फिलीपींस के साथ अमेरिका के खेमे में चला गया था। जापान अपने आर्थिक और व्यापारिक संबंधों के कारण पश्चिम के देशों में समीपता स्थापित कर रहा था। इससे एशिया की एकता को एक नया धक्का लगा था, क्योंकि एशिया के देश अलग-अलग खेमों में बँट गए थे। 1960 के दशक में एक नया मोड़ आया, जब शीत युद्ध के समय में आसियान के नाम से एक नए गुट का प्रादुर्भाव हुआ। इससे दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में नए आर्थिक और सुरक्षा संबंधी प्रयास किए गए। इन देशों में सांस्कृतिक एकरूपता की वजह से भी एक नए गुट ने जन्म लिया। लेकिन यह कहना कठिन होगा कि इन दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों से समूचे एशिया की पहचान या एकता बनाने में सहायता मिली है, या उससे धक्का लगा है, क्योंकि इन देशों ने अपनी नीति बहुत स्पष्ट नहीं की और केवल अपने ही गुट के अंदर भूमिपुत्र नीति को जन्म दिया। भारत भी अब आसियान का सहयोगी सदस्य बनने जा रहा है।भारत की पहल से दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन सार्क की स्थापना सन् 1985 में की गई, जिसके फलस्वरूप पड़ोसी देशों के आपसी सहयोग के लिए एक नया वातावरण तैयार हुआ। यह प्रयास शनैः शनैः उपयोगी रूप लेता जा रहा है, जो एशिया की पहचान बनाने की ओर एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है। व्यापार, निवेश, तकनीकी ज्ञान और संचार माध्यमों में बढ़ोतरी ने विश्व गाँव के विचार को भी पैदा किया। बढ़ते हुए व्यापार, निवेश, संचार एवं विज्ञान की आधुनिक तकनीकों ने पूरी दुनिया में एक-दूसरे पर निर्भर रहने के नए विचारों को जन्म दिया। अंग्रेजी भाषा, हॉलीवुड, कंप्यूटर और उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को प्रभावित किया, जिससे देशों में फासले कम हुए, और संस्कृति एवं सभ्यता भी प्रभावित हुई। हो सकता है कि इसके अच्छे परिणाम न हों, ऐसी आशंका भी व्यक्त की जाती है। उदाहरणतः जापान दूसरे महायुद्ध तक अपनी संस्कृति और सभ्यता व संयुक्त परिवार जैसी आधारभूत सामाजिक मान्यताओं को केवल अपनाए हुए ही नहीं था, बल्कि उससे चिपका हुआ भी था, लेकिन जापान जैसा सभ्य देश भी यूरोप के प्रभाव से बच नहीं सका।
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