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महोदय, दूसरे शब्दों में, आर्थिक, व्यापारिक, निवेश और तकनीकी कारणों से द्वितीय महायुद्ध के बाद और शीत युद्ध के दौरान एशिया के देशों में पुनः धुंधलापन पैदा हुआ। लेकिन यह बात सही नहीं है कि एशिया की संस्कृति और सभ्यता को पश्चिम के प्रभाव और आधुनिकतम तरीकों ने नष्ट कर दिया, हाँ, एक धक्का जरूर दिया। पर समय-समय पर एशिया का यह रूप, एशिया की यह सभ्यता और संस्कृति बलशाली तरीके से उदयमान होती दिखाई देती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1945 में अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में एशिया की पहचान पर लिखा है कि हजार वर्षों से, जब यूरोप अपने अंधकार के युग में था, तब एशिया ने अपने मनुष्यों की प्रगतिशील आत्मा को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया। उन्होंने यह विश्वास भी जताया कि एशिया की संस्कृति और सभ्यता यूरोप की संस्कृति और सभ्यता से अधिक प्राचीन है। आज के दिनों में भी चीन के नेता अपने यहाँ आध्यात्मिक क्रांति की बात करते दिखाई देते हैं और अपने आर्थिक विकास को भी प्रतिबिंबित करते हैं। मलेशिया के प्रधानमंत्री भी बड़े गर्व के साथ 'मलेशिया के रास्ते' की बात करते हैं और आधुनिकता और पारंपरिक संस्कृति के मिश्रण से मलेशिया का विकास करना चाहते हैं। भारत के प्रधानमंत्री भी मध्य मार्ग की बात करते हैं, जिसे वे भारत का पारंपरिक विचार कहा करते हैं। वियतनाम के यशस्वी नेता भी साम्यवादी विचारधारा को पारंपरिक सहिष्णुता के अनुसार ढालना चाहते थे। एशिया के इन सब नेताओं की समय-समय पर की गई घोषणाओं का वर्तमान संदर्भों में पूरा अर्थ लिया जाना चाहिए, क्योंकि यह एशिया की पहचान को नए सिरे से बनाने में सहायक सिद्ध हो रहा है।यहाँ यह भी बताना उचित होगा कि हाल के वर्षों में एशियाई देश, विशेष रूप से पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश, एशिया के सुदृढ़ देशों के रूप में उभरे हैं और इन देशों के आर्थिक विकास की दर विश्व के किसी भी अन्य देश की आर्थिक विकास दर से अधिक है, तथा यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाली शताब्दी में ये देश विश्व आर्थिक व्यवस्था के निर्माताओं के रूप में उभर सकते हैं। आर्थिक सफलता की इन कहानियों का श्रेय मुख्य रूप से अनुशासित कार्य, किफायत एवं बचत की ऊँची दरों जैसी एशियाई विशेषताओं को जाता है, तथा इनसे देशों की जनता के जीवन स्तर में सुधार आया है और एशिया की 'पुनः खोज' जैसा वातावरण बन रहा है। एशिया के देशों में अब आपसी भाईचारे की भावना उभर रही है, और इससे ये देश परस्पर निर्भर हो रहे हैं तथा शीत युद्ध के प्रभाव से मुक्त होते जा रहे हैं। हमारी सरकार ने अपने एशियाई पड़ोसियों के साथ बेहतर संबंध बनाने में पहल करके इस बदलते रुख के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाया है। इन सब प्रश्नों का जवाब आज उपलब्ध नहीं है, लेकिन शनैः शनैः इन प्रश्नों में ही इसके उत्तर मिलेंगे। एशिया अपने इन प्रश्नों के उत्तर में एक नए एशिया को जन्म देगा और अपनी एक नई पहचान बनाएगा। यूरोप और अमेरिका के आधुनिक औद्योगिक विकास में फर्क नज़र आता है।
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