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हमें यह भी समझना होगा कि अधूरापन जीवन का दुश्मन नहीं है। यह एक संकेत है, एक आह्वान है कि अब समय आ गया है कुछ बदलने का, कुछ छोड़ने का, और कुछ नया अपनाने का। यह अधूरापन हमें भीतर झाँकने के लिए मजबूर करता है, हमें सोचने के लिए विवश करता है कि क्या हम सचमुच उसी दिशा में जा रहे हैं जहाँ जाना चाहते थे। कभी-कभी किसी छोटे से क्षण में हमें वह पूर्णता महसूस होती है जो बड़े से बड़े प्रयासों में नहीं मिलती। जैसे किसी अजनबी की मदद करके जो सुख मिलता है, किसी भूले-बिसरे मित्र की आवाज सुनकर जो मुस्कान आती है, या फिर एकांत में अपने ही विचारों से मिलने पर जो संतोष महसूस होता है — वही पल असली पूर्णता के परिचायक हैं। हमें यह सीखना होगा कि जीवन को केवल बाहरी मापदंडों से नहीं नापा जा सकता। यह कोई प्रतियोगिता नहीं है जहाँ पहले आने वाला ही विजेता होता है। यह एक यात्रा है जिसमें हर व्यक्ति का मार्ग अलग है, हर अनुभव अनूठा है, और हर रुकाव एक सीख है। आज आवश्यकता है उस साहस की जो हमें अपने भीतर की सच्चाई स्वीकारने दे, उस विनम्रता की जो हमें दूसरों की भावनाओं को समझने दे, और उस संवेदना की जो हमें एक बेहतर मनुष्य बनाए। जब हम अपने अधूरेपन को स्वीकार कर लेते हैं, तभी हम उसमें पूर्णता की संभावना देख सकते हैं। यह स्वीकृति ही पहला कदम है एक नए जीवन की ओर — एक ऐसा जीवन जो दिखावे से मुक्त हो, जो संबंधों से समृद्ध हो, और जो आत्मा की शांति से पूरित हो। जीवन कोई दौड़ नहीं है जिसे जीतना है। यह एक संगीत है जिसे महसूस करना है, एक कविता है जिसे समझना है, और एक अवसर है जिसे सार्थक बनाना है।मनुष्य का जीवन परिवर्तनशील है। समय के साथ न केवल हमारे आसपास की दुनिया बदलती है, बल्कि हमारा दृष्टिकोण, हमारी सोच, हमारे रिश्ते और हमारी प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं। यह परिवर्तन धीमी गति से होता है, लेकिन इसका प्रभाव गहरा और स्थायी होता है। जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि जीवन की छोटी-छोटी घटनाएं धीरे-धीरे मिलकर हमारे सम्पूर्ण जीवन को आकार देती हैं। इन्हीं घटनाओं में छिपे होते हैं वे संकेत, जो हमें भीतर से बदलने का अवसर देते हैं। आज का मनुष्य बाहरी जीवन में चाहे जितना भी समृद्ध और व्यस्त दिखाई दे, भीतर से वह शान्ति और सन्तुलन की तलाश में भटक रहा है। यह तलाश उसे कभी धन में, कभी प्रतिष्ठा में, कभी रिश्तों में और कभी भौतिक सुख-सुविधाओं में दिखाई देती है, परन्तु वास्तव में वह शान्ति केवल आत्मचिन्तन और आत्मसाक्षात्कार से प्राप्त हो सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन को केवल बाहरी उपलब्धियों से न आंकें, बल्कि यह देखें कि हम भीतर से कितने संतुलित, कितने संतुष्ट और कितने सजग हैं। जब मनुष्य अपने भीतर की आवाज को सुनने लगता है, तब उसका जीवन एक नई दिशा लेता है। आज का युग तेजी से बदल रहा है।
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