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महोदय, भारत जैसे बहुभाषाभाषी देश में, जहाँ विभिन्न भाषा परिवारों की 1652 भाषाएँ बोली जाती हों, अष्टम सूची के अनुसार भी देश की 18 प्रधान भाषाएँ हों; खान-पान, वेशभूषा, रीति-रिवाज़ आदि की दृष्टि से भी एक प्रांत दूसरे प्रांत से बहुत भिन्न हो, वहाँ देश की अखंडता को बनाए रखने के लिए सबसे अधिक आवश्यक यह है कि संपूर्ण देश के नागरिकों का वैचारिक स्तर पर आदान-प्रदान हो, सांस्कृतिक विनिमय हो, एक दूसरे को समझने-सराहने की चेष्टा हो । जहाँ संपूर्ण देश की भाषा एक हो, वहाँ तो शायद उस एक राष्ट्रभाषा से यह संभव भी हो सके, किंतु भारत जैसे विशाल तथा विभिन्न संस्कृतियों और विविध भाषाओं वाले देश में अनुवाद ही सबसे सशक्त माध्यम है, जो संपूर्ण देश को एक सूत्र में बाँधे रखने में सहायक हो सकता है। द्विभाषिकता का महत्व भारत में प्राचीन काल से रहा है। आज भी भारतीय जनसंख्या के सांख्यिकीय आँकड़े यह बताते हैं कि भारत में द्विभाषियों का प्रतिशत काफ़ी ऊँचा है। कहने की आवश्यकता नहीं कि सभी भारतवासी सामान्यतः हिंदी या निकटवर्ती प्रांत की भाषा को दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं। अहिंदीभाषियों के मध्य हिंदी का प्रचार, शिक्षा, व्यवसाय, जनसंचार, फिल्म आदि कई कारणों से हुआ। द्विभाषिकता का महत्व रोज़ी-रोटी तथा आत्मविकास या आत्मप्रचार से बढ़ता है। यह द्विभाषिकता अनुवाद की मूल भित्ति है। एक व्यक्ति अपने भावों व विचारों को दूसरे तक पहुँचा सके तथा दूसरे की बात स्वयं समझ सके, इसीलिए वह दो या अधिक भाषाएँ सीखता है। यह व्यावहारिक सत्य है कि जो व्यक्ति जितनी अधिक भाषाएँ जानता है, वह उतना ही बहुज्ञ है, क्योंकि भाषा के सहारे उसका, परिचय-क्षेत्र तो बढ़ता ही है, वह विभिन्न भाषिक संस्कृतियों से भी परिचित होता है। देश चाहे भौगोलिक दृष्टि से छोटा हो या बड़ा, शक्तिशाली हो या निर्बल, धनी हो या निर्धन, संश्लिष्ट अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए, दूसरे देशों की साहित्यिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक स्थिति को समझने तथा उनसे लाभ उठाने के लिए उसे अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है। सभी विकसित देशों में इसीलिए अनुवाद का बड़ा महत्व है। अनुवादं संबंधी बड़े-बड़े संस्थान हैं तथा बड़े सुनियोजित ढंग से अनुवाद कार्य होता है। मैं आपको यूरोप के एक छोटे से देश बल्गारिया का उदाहरण देता हूँ। बल्गारिया की जनसंख्या 40 लाख है। बल्गारिया में पर्यटकों की वर्ष भर भरमार रहती है और उसका विदेशी मुद्रा अर्जन का मुख्य स्रोत भी पर्यटन उद्योग ही है। विश्व के अनेक देशों के पर्यटक वहाँ आते हैं, जिनमें बल्गारियन भाषा जानने वालों की संख्या नहीं के बराबर ही होती है। इन पर्यटकों की सुख-सुविधा के लिए तथा उन्हें भाषा की कठिनाई न हो इसलिए दुभाषियों की, जो यूरोप की विभिन्न भाषाएँ जानते हों, आवश्यकता होती है। इसके लिए विश्व-विद्यालयों में नियमित रूप से युवक-युवतियाँ विदेशी भाषाएँ सीखते हैं और दुभाषिए का काम करते हैं।
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