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महोदय, हमारा जो संविधान तैयार हुआ है, उसमें भी इस बात का प्रयास किया गया है कि देश में लोकतंत्र पूरी तरह से लागू किया जाए और जनता को लोकतंत्र की सारी सुख-सुविधा मिल सके । सबसे पहले मैं आपको इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ कि आपने मुझे इस सम्मेलन में कुछ कहने का अवसर दिया है। आपके सामने जो विषय आएँगे वे इतने महत्व के हैं कि प्रत्येक हिंदुस्तानी चाहे वह किसी भी काम में लगा हो उन पर कुछ न कुछ ध्यान अवश्य देता होगा । यह एक मानी हुई बात है कि बच्चा जैसा तैयार किया जाता है वह बड़ा होने पर वैसा ही निकलता है। शिक्षा का काम यही है कि उसको अच्छी तरह से सुलझे तरीके पर तैयार करे और उसको इस योग्य बनाए कि उसे जिस किसी भी काम में लगाया जाए वह उस काम को कुशलता और सफलता के साथ पूरा कर सके । हमारे देश में जो शिक्षा-पद्धति अभी तक जारी है, वह नई नहीं है बल्कि यदि मैं यह कहूँ कि वह 125 वर्ष पुरानी है तो गलत नहीं होगा । 125 वर्ष पहले जिस उद्देश्य को सामने रखकर यह शिक्षा पद्धति जारी की गई थी, वह उद्देश्य अब नहीं रहा पर शिक्षा पद्धति अब तक लगभग वही है। मैं मानता हूँ कि इस बात का प्रयत्न किया जा रहा है कि उसमें परिवर्तन किया जाए जिससे हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता मिल सके । जहाँ तक मुझे मालूम है इस काम में अभी तक हम सफल नहीं हुए हैं। मैं तो शायद यह भी कह सकता हूँ कि उस शिक्षा-पद्धति को बदलने में जो प्रयास किया जाना चाहिए था वह अभी तक नहीं किया गया है। इस देश में या सभी देशों में शिक्षा के तीन भाग होते हैं एक तो वह जिसमें छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा दी जाती है, दूसरा वह जिसमें युवावस्था के पहले बड़े होने तक और तीसरा वह जिसमें युवावस्था के विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती है। इन तीनों भागों की शिक्षा पद्धतियाँ अलग-अलग हैं परंतु वे एक-दूसरे से मिलती-जुलती होती हैं, और एक से दूसरे में जाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए । इसलिए यदि हम अपने देश की शिक्षा में सुधार चाहते हैं तो सबसे अधिक आवश्यक यह है कि सर्वप्रथम प्राथमिक शिक्षा में, उसके बाद माध्यमिक शिक्षा और फिर विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार किया जाना चाहिए।
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