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सुरेश बनाम राज्य सुरेश एक छोटे गाँव का निवासी था, जो अपनी माँ के साथ रहता था। वह मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था, लेकिन उसकी ज़िंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उसे अदालत के कटघरे में ला खड़ा किया। एक दिन गाँव के एक व्यापारी, रमेश, की दुकान में चोरी हो गई। चोरी रात के अंधेरे में हुई थी, और दुकान से कई कीमती सामान गायब हो गए थे। गाँव में हड़कंप मच गया। अगली सुबह जब रमेश ने पुलिस को सूचना दी, तो जाँच शुरू हुई। कुछ ग्रामीणों ने दावा किया कि उन्होंने सुरेश को रात में दुकान के आसपास घूमते देखा था। पुलिस ने सुरेश को हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू की। सुरेश बार-बार कहता रहा कि वह निर्दोष है, लेकिन पुलिस ने गवाहों के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया और अदालत में पेश किया। अदालत में मुकदमा शुरू हुआ। सरकारी वकील ने दलील दी कि सुरेश चोरी की रात दुकान के पास था और उसके पास कोई ठोस बहाना नहीं था कि वह वहाँ क्यों गया था। इसके अलावा, कुछ चुराए गए सामान सुरेश के घर के पास मिले थे, जिससे शक और गहरा हो गया। सुरेश के वकील ने बचाव में कहा कि सुरेश को फँसाया जा रहा है। उसने बताया कि चोरी की रात सुरेश वास्तव में अपनी बीमार माँ के लिए दवा लाने गया था और दुकान के पास से गुजरा था। बचाव पक्ष ने कुछ और गवाह प्रस्तुत किए, जिन्होंने कहा कि सुरेश का व्यवहार हमेशा से ईमानदार रहा है और वह चोरी जैसी घटना को अंजाम नहीं दे सकता। न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और पुलिस द्वारा प्रस्तुत सबूतों की गहराई से जाँच की। गवाहों के बयान विरोधाभासी थे और सुरेश के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था। आखिरकार, न्यायाधीश ने अपने निर्णय में कहा कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर किसी निर्दोष व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सुरेश को संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने उसे बरी कर दिया। यह फैसला सुनकर सुरेश की आँखों में आँसू आ गए। गाँववालों को भी एहसास हुआ कि उन्होंने बिना सोचे-समझे सुरेश पर इल्ज़ाम लगाया था। अदालत ने पुलिस को भी हिदायत दी कि बिना ठोस सबूतों के किसी निर्दोष को अपराधी न ठहराया जाए। इस फैसले के बाद सुरेश ने अपनी पुरानी ज़िंदगी में लौटने की कोशिश की, लेकिन यह घटना उसे जीवन भर याद रही। उसने तय किया कि वह कानून की पढ़ाई करेगा ताकि भविष्य में किसी और निर्दोष को इस तरह की मुसीबतों का सामना न करना पड़े।
सुरेश बनाम राज्य सुरेश एक छोटे गाँव का निवासी था, जो अपनी माँ के साथ रहता था। वह मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था, लेकिन उसकी ज़िंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उसे अदालत के कटघरे में ला खड़ा किया। एक दिन गाँव के एक व्यापारी, रमेश, की दुकान में चोरी हो गई। चोरी रात के अंधेरे में हुई थी, और दुकान से कई कीमती सामान गायब हो गए थे। गाँव में हड़कंप मच गया। अगली सुबह जब रमेश ने पुलिस को सूचना दी, तो जाँच शुरू हुई। कुछ ग्रामीणों ने दावा किया कि उन्होंने सुरेश को रात में दुकान के आसपास घूमते देखा था। पुलिस ने सुरेश को हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू की। सुरेश बार-बार कहता रहा कि वह निर्दोष है, लेकिन पुलिस ने गवाहों के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया और अदालत में पेश किया। अदालत में मुकदमा शुरू हुआ। सरकारी वकील ने दलील दी कि सुरेश चोरी की रात दुकान के पास था और उसके पास कोई ठोस बहाना नहीं था कि वह वहाँ क्यों गया था। इसके अलावा, कुछ चुराए गए सामान सुरेश के घर के पास मिले थे, जिससे शक और गहरा हो गया। सुरेश के वकील ने बचाव में कहा कि सुरेश को फँसाया जा रहा है। उसने बताया कि चोरी की रात सुरेश वास्तव में अपनी बीमार माँ के लिए दवा लाने गया था और दुकान के पास से गुजरा था। बचाव पक्ष ने कुछ और गवाह प्रस्तुत किए, जिन्होंने कहा कि सुरेश का व्यवहार हमेशा से ईमानदार रहा है और वह चोरी जैसी घटना को अंजाम नहीं दे सकता। न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और पुलिस द्वारा प्रस्तुत सबूतों की गहराई से जाँच की। गवाहों के बयान विरोधाभासी थे और सुरेश के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था। आखिरकार, न्यायाधीश ने अपने निर्णय में कहा कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर किसी निर्दोष व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सुरेश को संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने उसे बरी कर दिया। यह फैसला सुनकर सुरेश की आँखों में आँसू आ गए। गाँववालों को भी एहसास हुआ कि उन्होंने बिना सोचे-समझे सुरेश पर इल्ज़ाम लगाया था। अदालत ने पुलिस को भी हिदायत दी कि बिना ठोस सबूतों के किसी निर्दोष को अपराधी न ठहराया जाए। इस फैसले के बाद सुरेश ने अपनी पुरानी ज़िंदगी में लौटने की कोशिश की, लेकिन यह घटना उसे जीवन भर याद रही। उसने तय किया कि वह कानून की पढ़ाई करेगा ताकि भविष्य में किसी और निर्दोष को इस तरह की मुसीबतों का सामना न करना पड़े।
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