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Highcourt case In hindi (Hindi)
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हाईकोर्ट केस का उदाहरण: विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997)विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) का मामला भारत के न्यायिक इतिहास में एक ऐतिहासिक निर्णय के रूप में जाना जाता है। यह मामला कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित था और इसके निर्णय ने पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश तय किए। इस केस के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने "विशाखा गाइडलाइन्स" लागू की, जो कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए कानूनी मानदंड बन गईं। इस फैसले ने भारत में लैंगिक न्याय और समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया।इस मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि राजस्थान राज्य में एक सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना हुई थी। भंवरी देवी एक सरकारी कार्यकर्ता थीं, जो बाल विवाह रोकने के लिए काम कर रही थीं। उनके इस कार्य के कारण गांव के प्रभावशाली लोगों ने उनके साथ अत्याचार किया और उन्हें न्याय से वंचित रखा गया। जब यह मामला अदालत में गया, तो स्थानीय न्यायपालिका ने आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया। इस फैसले के बाद महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए "विशाखा" नामक एक संगठन सहित कई संगठनों ने राजस्थान सरकार के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर की।विशाखा और अन्य संगठनों ने तर्क दिया कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए भारत में कोई स्पष्ट कानून नहीं था और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन था। उन्होंने मांग की कि सरकार को महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए सख्त कानून बनाने चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और 13 अगस्त 1997 को एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। कोर्ट ने माना कि कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और सरकार को इस मुद्दे पर तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता है। कोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों और कन्वेंशनों का हवाला देते हुए कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसके साथ ही, कोर्ट ने "विशाखा गाइडलाइन्स" जारी कीं, जो तब तक लागू रहने वाली थीं जब तक कि सरकार इस विषय पर उचित कानून नहीं बना देती। इन गाइडलाइन्स के तहत सभी संगठनों और संस्थानों को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए आंतरिक शिकायत समिति बनाने का निर्देश दिया गया।इस फैसले का प्रभाव बहुत व्यापक रहा। बाद में, 2013 में भारत सरकार ने "यौन उत्पीड़न (महिला कार्यस्थल पर रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम" पारित किया, जो विशाखा गाइडलाइन्स को एक कानूनी रूप में लागू करता है। इस कानून ने महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और लैंगिक न्याय को बढ़ावा दिया।इस प्रकार, विशाखा बनाम राजस्थान राज्य का मामला भारतीय न्यायपालिका द्वारा लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इस फैसले ने न केवल कार्यस्थल पर महिलाओं के अधिकारों को मजबूती दी, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि भविष्य में इस तरह के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षा मिले।
हाईकोर्ट केस का उदाहरण: विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997)विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) का मामला भारत के न्यायिक इतिहास में एक ऐतिहासिक निर्णय के रूप में जाना जाता है। यह मामला कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित था और इसके निर्णय ने पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश तय किए। इस केस के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने "विशाखा गाइडलाइन्स" लागू की, जो कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए कानूनी मानदंड बन गईं। इस फैसले ने भारत में लैंगिक न्याय और समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया।इस मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि राजस्थान राज्य में एक सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना हुई थी। भंवरी देवी एक सरकारी कार्यकर्ता थीं, जो बाल विवाह रोकने के लिए काम कर रही थीं। उनके इस कार्य के कारण गांव के प्रभावशाली लोगों ने उनके साथ अत्याचार किया और उन्हें न्याय से वंचित रखा गया। जब यह मामला अदालत में गया, तो स्थानीय न्यायपालिका ने आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया। इस फैसले के बाद महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए "विशाखा" नामक एक संगठन सहित कई संगठनों ने राजस्थान सरकार के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर की।विशाखा और अन्य संगठनों ने तर्क दिया कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए भारत में कोई स्पष्ट कानून नहीं था और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन था। उन्होंने मांग की कि सरकार को महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए सख्त कानून बनाने चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और 13 अगस्त 1997 को एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। कोर्ट ने माना कि कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और सरकार को इस मुद्दे पर तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता है। कोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों और कन्वेंशनों का हवाला देते हुए कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसके साथ ही, कोर्ट ने "विशाखा गाइडलाइन्स" जारी कीं, जो तब तक लागू रहने वाली थीं जब तक कि सरकार इस विषय पर उचित कानून नहीं बना देती। इन गाइडलाइन्स के तहत सभी संगठनों और संस्थानों को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए आंतरिक शिकायत समिति बनाने का निर्देश दिया गया।इस फैसले का प्रभाव बहुत व्यापक रहा। बाद में, 2013 में भारत सरकार ने "यौन उत्पीड़न (महिला कार्यस्थल पर रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम" पारित किया, जो विशाखा गाइडलाइन्स को एक कानूनी रूप में लागू करता है। इस कानून ने महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और लैंगिक न्याय को बढ़ावा दिया।इस प्रकार, विशाखा बनाम राजस्थान राज्य का मामला भारतीय न्यायपालिका द्वारा लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इस फैसले ने न केवल कार्यस्थल पर महिलाओं के अधिकारों को मजबूती दी, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि भविष्य में इस तरह के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षा मिले।
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