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महोदय, हम अवश्य ही आत्मनिर्भर होना चाहेंगे लेकिन जब इतने बड़े पैमाने पर सूखा पड़ा और जिससे इतने ज्यादा लोगों को कष्ट झेलना पड़ रहा हो, तो अगर हम आयात द्वारा उनकी सहायता कर सकते हों तो इसे गलत काम नहीं समझना चाहिए। फिर भी, हमने मामूली आयात से ही काम चलाया है। देश के कुछ भागों में लोगों के दारुण कष्ट पर कुछ माननीय सदस्यों ने जो व्यथा व्यक्त की है मैं भी उनमें शरीक हूँ। मैं उन लोगों में नहीं हूँ जो आम तौर पर अखबारों के हवाले से कुछ कहा करते हैं और मैं यह भी नहीं मानती कि अखबारों में सब कुछ सही छपता है। लेकिन अगर कोई बात छापे में देखने को मिलती है तो माननीय सदस्य बहुत प्रभावित होते हैं। मुझे जिस अखबार का जिक्र यहाँ करना है वह मुझे अभी कुछ देर पहले ही देखने को मिला है। इसमें एक विदेशी संवाददाता ने जिसने त्रिपुरा को छोड़ सूखाग्रस्त सभी राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मैसूर का दौरा किया है, जो कुछ लिखा है वह मैं आपको सुनाना चाहूँगी "मैंने देखा कि अधिकांश भारतीय कृषि क्षेत्र वर्षों की कमी का सामना करने के लिए पहले की अपेक्षा कहीं अधिक समर्थ हैं। हरित क्रांति असफल नहीं हुई है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब पिछले साल गर्व के साथ कहा था कि भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है तो वह लगभग सही बात कह रही थीं।" जैसाकि मैंने कहा, हमारी अर्थव्यवस्था ऐसी परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम है। इस साल, हुआ यह है कि मुख्य रूप से वर्षा सिंचित प्रदेशों में मोटे अनाज के उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है। हमारी विकास-गतिविधियों के कारण गेहूँ की पैदावार वर्ष-प्रति-वर्ष बढ़ती रही है। जिन इलाकों में अक्सर सूखा पड़ता है उनके लिए अलग से उपाय करने की जरूरत है। जैसा कि सदन को मालूम है, एक विशेष दल इन दिनों ऐसे क्षेत्रों के विकास के लिए कार्य-प्रणाली को अंतिम रूप दे रहा है जो समग्र विकास के अंग के रूप में कार्यान्वित होगी। हमारी चिंता का एक और विषय है खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि की समस्या । कृषि उत्पादन में हुई कमी की स्थिति का अनुचित फायदा उठाया गया है और प्रत्येक प्रयास को विफलता का सूचक बताते हुए शुरू से ही अभाव की मानसिकता को बढ़ावा दिया गया है, जिसके कारण विभिन्न स्तरों पर जमाखोरी तथा सट्टेबाजी की प्रवृत्ति पनपी है। सदन को मालूम है कि हम अगले सीजन से गेहूँ के थोक व्यापार को अपने हाथ में लेने की योजना बना रहे हैं। इसका उद्देश्य खाद्य अर्थव्यवस्था के अंतर्गत कुछ उन तत्वों को निर्मूल करना है जो जमाखोरी और सट्टेबाजी को बढ़ावा देते हैं। मैं जानती हूँ कि यह आज के ढाँचे में किया जाने वाला एक बड़ा परिवर्तन है जिसका निहित स्वार्थ वाले लोग विरोध करेंगे और उनकी ओर से इसे विफल करने की सभी कोशिशें की जाएँगी।
महोदय, हम अवश्य ही आत्मनिर्भर होना चाहेंगे लेकिन जब इतने बड़े पैमाने पर सूखा पड़ा और जिससे इतने ज्यादा लोगों को कष्ट झेलना पड़ रहा हो, तो अगर हम आयात द्वारा उनकी सहायता कर सकते हों तो इसे गलत काम नहीं समझना चाहिए। फिर भी, हमने मामूली आयात से ही काम चलाया है। देश के कुछ भागों में लोगों के दारुण कष्ट पर कुछ माननीय सदस्यों ने जो व्यथा व्यक्त की है मैं भी उनमें शरीक हूँ। मैं उन लोगों में नहीं हूँ जो आम तौर पर अखबारों के हवाले से कुछ कहा करते हैं और मैं यह भी नहीं मानती कि अखबारों में सब कुछ सही छपता है। लेकिन अगर कोई बात छापे में देखने को मिलती है तो माननीय सदस्य बहुत प्रभावित होते हैं। मुझे जिस अखबार का जिक्र यहाँ करना है वह मुझे अभी कुछ देर पहले ही देखने को मिला है। इसमें एक विदेशी संवाददाता ने जिसने त्रिपुरा को छोड़ सूखाग्रस्त सभी राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मैसूर का दौरा किया है, जो कुछ लिखा है वह मैं आपको सुनाना चाहूँगी "मैंने देखा कि अधिकांश भारतीय कृषि क्षेत्र वर्षों की कमी का सामना करने के लिए पहले की अपेक्षा कहीं अधिक समर्थ हैं। हरित क्रांति असफल नहीं हुई है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब पिछले साल गर्व के साथ कहा था कि भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है तो वह लगभग सही बात कह रही थीं।" जैसाकि मैंने कहा, हमारी अर्थव्यवस्था ऐसी परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम है। इस साल, हुआ यह है कि मुख्य रूप से वर्षा सिंचित प्रदेशों में मोटे अनाज के उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है। हमारी विकास-गतिविधियों के कारण गेहूँ की पैदावार वर्ष-प्रति-वर्ष बढ़ती रही है। जिन इलाकों में अक्सर सूखा पड़ता है उनके लिए अलग से उपाय करने की जरूरत है। जैसा कि सदन को मालूम है, एक विशेष दल इन दिनों ऐसे क्षेत्रों के विकास के लिए कार्य-प्रणाली को अंतिम रूप दे रहा है जो समग्र विकास के अंग के रूप में कार्यान्वित होगी। हमारी चिंता का एक और विषय है खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि की समस्या । कृषि उत्पादन में हुई कमी की स्थिति का अनुचित फायदा उठाया गया है और प्रत्येक प्रयास को विफलता का सूचक बताते हुए शुरू से ही अभाव की मानसिकता को बढ़ावा दिया गया है, जिसके कारण विभिन्न स्तरों पर जमाखोरी तथा सट्टेबाजी की प्रवृत्ति पनपी है। सदन को मालूम है कि हम अगले सीजन से गेहूँ के थोक व्यापार को अपने हाथ में लेने की योजना बना रहे हैं। इसका उद्देश्य खाद्य अर्थव्यवस्था के अंतर्गत कुछ उन तत्वों को निर्मूल करना है जो जमाखोरी और सट्टेबाजी को बढ़ावा देते हैं। मैं जानती हूँ कि यह आज के ढाँचे में किया जाने वाला एक बड़ा परिवर्तन है जिसका निहित स्वार्थ वाले लोग विरोध करेंगे और उनकी ओर से इसे विफल करने की सभी कोशिशें की जाएँगी।
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